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हिन्दी-इंगलिश का काकटेल : हिगिलश 'Contest'

Posted On: 20 Sep, 2013 Others,Contest में

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हिन्दी की स्थिति का अनुमान यहीं से लगाया जा सकता है जब कोर्इ बड़ा धार्मिक संगठन राम को रामा, कृष्ण को कृष्णा, योग को योगा और शिव को शिवा कहते आत्म-गौरवान्वित अनुभव करता हैं और जो संगठन इस प्रकार के शब्दों का प्रयोग करते हैं वहीं बड़ी भीड़ इकटठी हो हरे रामा-हरे कृष्णा की ताल पर नाचने लगती है। वास्तव में भारतीयों का यही सबसे बड़ा दुखांत है। अंग्रेजी को उच्च और हिन्दी को हीन मान, आंख बंद कर अंग्रेजी के पीछे-पीछे भागते ही जाना। अंग्रेजी या कोर्इ भी अन्य विदेशी भाषा सीखना कोर्इ गलत नहीं किन्तु किसी भाषा को लेकर इतना अंधविश्वास भी उचित नहीं। भाषा को मात्र ज्ञान और सम्पर्क हेतु सीखना तो उचित है किन्तु उसे ही सर्वेसर्वा मान अन्य सभी को भूल जाना मूढ़ता नहीं तो और क्या है।
हिन्दी एक ऐसी भाषा है जो संस्कृत से उत्पन्न होकर, अन्य कर्इ भाषाओं को स्वयं में मिलाते हुए उन्हें हिन्दीमय बना देती है। जिस प्रकार गंगा नदी हिमालय से बहती हुर्इ जैसे-जैसे दक्षिण की ओर बढ़ती है, वह और कर्इ नदियों को स्वयं में मिलाते हुए बहते-बहते अनेक नामों, अनेक रूपों से गुजरती हुर्इ अंत में समुद्र में विलीन हो जाती है। ठीक उसी प्रकार हिन्दी भी गंगा की ही भांति संस्कृत से निकलकर पहले तो अन्य प्रान्तीय भाषाओं को स्वयं में समावेशित करती है जैसे – अवधि, भोजपुरी, पंजाबी, ब्रज, गढ़वाली, जौनसारी एवं अन्य भाषायें जिनके लय से हिन्दी और अधिक समृद्ध हो उठती है। उसके पश्चात कर्इ और विदेशी भाषाओं को हिन्दी में स्थान मिलता हैं जैसे – उर्दू, फारसी, अरबी और अंग्रेजी।
भारत पर अनेकों विदेशियों ने हजारों साल तक राज किया जिसका प्रभाव हिन्दी पर सर्वाधिक पड़ा। जिस कालखंड में जिस शासक का शासनकाल चला, उसकी मातृभाषा ही राजभाषा घोषित हुर्इ। जो लम्बे समय तक प्रयोग में आने के कारण आम जनमानस द्वारा हिन्दी में इस प्रकार घुलमिल गर्इ जिसे पृथक-पृथक समझ पाना अत्यन्त ही कठिन हो गया। हिन्दी में व्यवहारिक बोलचाल में आज सर्वाधिक उर्दू के शब्द सर्वाधिक प्रयोग किये जाते हैं जिसे कोर्इ भी सामान्य समझ वाला व्यकित उर्दू के शब्दों को अन्य न जानकर हिन्दी के रूप में ही जानता है। मुगल शासन के पश्चात भारत पर लगभग 100 वर्षों तक अंग्रेजों ने शासन किया। उन्होंने भी गत शासकों की ही भांति अपनी सुविधा हेतु अपनी मातृभाषा अंग्रेजी को ही राजभाषा घोषित कर दिया। हिन्दी जब अंग्रेजी की सरपरस्ती में आर्इ तो वह अब पहले की भांति और अधिक समृद्ध न हो सकी। अपितु दिनों-दिन उसकी स्थिति बद से बदतर होने लगी। कारण स्पष्ट था। हिन्दी और अंग्रेजी के बीच वैसा तालमेल न बैठना जैसा अन्य भाषाओं के साथ क्योंकि हिन्दी अपने-आपमें एक पूर्ण रूप से समृद्ध भाषा है। संस्कृत-हिन्दी व्याकरण का अति उत्कृष्ट स्तर का होना, प्रत्येक शब्द का पूर्णरूपेण सही स्थान पर सही प्रयोग होना, हिन्दी की वैज्ञानिकता को दर्शाता है। जबकि इसके विपरीत अंगे्रजी की व्याकरण का कोर्इ स्पष्ट वैज्ञानिक रूपरेखा न होने के कारण उसका हिन्दी के साथ सामंजस्य स्थापित नहीं हो पाया। जिस प्रकार यदि गंगा जल में यमुना जल, ब्रहमपुत्र जल, गोदावरी या कोर्इ अन्य जल मिलाने से गंगा कभी दूषित नहीं होती किन्तु यदि गंगा जल में शराब मिला दी जाये तब वह दूषित हो ही जाती है। इसी प्रकार हिन्दी-इंगलिश के काकटेल को हम सभी हिगिलश के रूप में जानते हैं।

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18 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Pradeep Kesarwani के द्वारा
September 20, 2013

बिलकुल सही कह रहे हैं अमरसिन जी, हिंदी भाषा का रूपरेखा और जो अग्रेज़ी भाषा की कभी नही हो पायेगी, हिंदी अपने में पूर्ण भाषा हैं. सुन्दर अभिलेख के लिए बधाई !!!1

bdsingh के द्वारा
September 20, 2013

बहुत अच्छे विचार । जन-जन के मन की तुम बात करो। अपनी हिन्दी का तुम  सम्मान करो।।

bdsingh के द्वारा
September 20, 2013

बहुत अच्छे विचार ।किसी भाषा का अंधानुकरण ठीक नहीं। जन-जन के मन की तुम बात करो। अपनी हिन्दी का तुम  सम्मान करो।।

bdsingh के द्वारा
September 20, 2013

बहुत अच्छे विचार। किसी भाषा का अंधानकरण ठीक नहीं। जन-जन के मन की बात करो। अपनी हिन्दी का सम्मान को।।

vaidya surenderpal के द्वारा
September 22, 2013

सही कहा, अच्छे आलेख के लिए बधाई…

amarsin के द्वारा
September 23, 2013

saadar dhanayavaad….

amarsin के द्वारा
September 23, 2013

saadar dhanayavaad, bdsingh ji….

yogi sarswat के द्वारा
September 23, 2013

भारत पर अनेकों विदेशियों ने हजारों साल तक राज किया जिसका प्रभाव हिन्दी पर सर्वाधिक पड़ा। जिस कालखंड में जिस शासक का शासनकाल चला, उसकी मातृभाषा ही राजभाषा घोषित हुर्इ। जो लम्बे समय तक प्रयोग में आने के कारण आम जनमानस द्वारा हिन्दी में इस प्रकार घुलमिल गर्इ जिसे पृथक-पृथक समझ पाना अत्यन्त ही कठिन हो गया। हिन्दी में व्यवहारिक बोलचाल में आज सर्वाधिक उर्दू के शब्द सर्वाधिक प्रयोग किये जाते हैं जिसे कोर्इ भी सामान्य समझ वाला व्यकित उर्दू के शब्दों को अन्य न जानकर हिन्दी के रूप में ही जानता है। मुगल शासन के पश्चात भारत पर लगभग 100 वर्षों तक अंग्रेजों ने शासन किया। उन्होंने भी गत शासकों की ही भांति अपनी सुविधा हेतु अपनी मातृभाषा अंग्रेजी को ही राजभाषा घोषित कर दिया। हिन्दी जब अंग्रेजी की सरपरस्ती में आर्इ तो वह अब पहले की भांति और अधिक समृद्ध न हो सकी। अपितु दिनों-दिन उसकी स्थिति बद से बदतर होने लगी। कारण स्पष्ट था। हिन्दी और अंग्रेजी के बीच वैसा तालमेल न बैठना जैसा अन्य भाषाओं के साथ क्योंकि हिन्दी अपने-आपमें एक पूर्ण रूप से समृद्ध भाषा है। संस्कृत-हिन्दी व्याकरण का अति उत्कृष्ट स्तर का होना, प्रत्येक शब्द का पूर्णरूपेण सही स्थान पर सही प्रयोग होना, हिन्दी की वैज्ञानिकता को दर्शाता है। बढ़िया आलेख अमर सिन जी !

amarsin के द्वारा
September 23, 2013

bahut bahut dhanayavaad…. sarswat ji.

SATYA SHEEL AGRAWAL के द्वारा
September 23, 2013

अमर जी,बहुत ही सच्चाई के साथ हिंदी की व्यथा का वर्णन किया है,और हिंगलिश की व्याख्या की है **********जबकि इसके विपरीत अंगे्रजी की व्याकरण का कोर्इ स्पष्ट वैज्ञानिक रूपरेखा न होने के कारण उसका हिन्दी के साथ सामंजस्य स्थापित नहीं हो पाया। जिस प्रकार यदि गंगा जल में यमुना जल, ब्रहमपुत्र जल, गोदावरी या कोर्इ अन्य जल मिलाने से गंगा कभी दूषित नहीं होती किन्तु यदि गंगा जल में शराब मिला दी जाये तब वह दूषित हो ही जाती है। इसी प्रकार हिन्दी-इंगलिश के काकटेल को हम सभी हिगिलश के रूप में जानते हैं।*********

seemakanwal के द्वारा
September 23, 2013

सुन्दर प्रस्तुती . आभार .

yamunapathak के द्वारा
September 23, 2013

हिन्दी अंग्रेज़ी दोनों साथ-साथ पढी,लिखी,बोली जाए..कोई भाषा किसी पर आधिपत्य ना करे यही हमारी चाह है बस साभार

amarsin के द्वारा
September 23, 2013

yamuna ji, saadar dhanayavaad….

amarsin के द्वारा
September 23, 2013

saadar dhanaavad, seemakanwal ji.

amarsin के द्वारा
September 23, 2013

saadar dhanayavad, satya sheel agarwal ji..

Ritu Gupta के द्वारा
September 23, 2013

सुंदर आलेख अमर जी

Ritu Gupta के द्वारा
September 25, 2013

अति उत्तम लेख आभार


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