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मन-रहस्य (हाइकू )

Posted On: 1 Jul, 2014 Others,कविता में

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(1)
हैं कुछ शब्द
थे कहे-अनकहे
अनंत मौन।
(2)
हैं कुछ भाव
थे जाने-अनजाने
अपरिचित।
(3)
हैं कुछ पल
थी अंतहीन राह
चलता रहूँ।
(4)
हैं कुछ प्राण
रहे नहीं अपने
सदा चलाएमान।

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5 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

PAPI HARISHCHANDRA के द्वारा
July 1, 2014

अमर सिंह जी मन रहष्य ,सुन्दर कवि की उक्तियाँ ,शब्द कम, रहष्य ज्यादा, यही कवि का रहष्य होता है आप सफल कवि बनोगे शांत मन se लगे रहो मन रहष्य अवश्य om शांति शांति japega

ranjanagupta के द्वारा
July 2, 2014

सुन्दर ! अमरसेन जी ,रचना स्वयम में परिपूर्ण !

amarsin के द्वारा
July 2, 2014

सादर धन्यवाद रंजना जी।

amarsin के द्वारा
July 2, 2014

सादर धन्यवाद हरिश्चंद्र जी। हाइकु कविता पद्धति मे सर्वप्रथम रचना मन-रहस्य से की है। ईश्वर की कृपा रही निकट भविष्य मे ओर अधिक लिखते ही रहना है। कम शब्दो मे स्पष्ट भाव व्यक्त करने का कलात्मक ढंग।

sadguruji के द्वारा
July 5, 2014

आदरणीय अमर सिंह जी ! सुप्रभात ! गागर में सागर भरी हुई बहुत भावपूर्ण और सुन्दर हाइकू कविता ! मुझे बहुत अच्छी लगी ! यूँ ही लिखते रहिये ! शुभकामनाओ सहित !


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