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आज्ञा भई अकाल की, तभी चलायो पंथ

Posted On: 12 Mar, 2015 Religious,Others में

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वर्तमान परिदृष्य को देखकर एक कहानी याद आती है कि एक जंगल के पास के गांव में कुछ लोग रहते थे। अक्सर वहां हाथी आते और खेत उजाड़ जाते। कभी-कभी वे बस्ती को भी नुकसान पहुंचाते थे। इस स्थिति से निबटने के लिए वहां के लोग हाथी से बचने के उपाय ढूंढने लगे। उनसे बचाव एवं रोकथाम के लिए अनेकों प्रकार की सावधानियों और सुरक्षा के उपाय खोजकर, उनकी षिक्षा का प्रसार करने लगे। अनेकों नये-नये तरीके निकलने लगे। सभी एक दूसरे को नई-नई विधियां सुझाते। थोड़े दिनों में हाथियों का प्रकोप कम होने लगा लेकिन तब शेरों ने आतंक मचाना प्रारम्भ कर दिया। फिर षिक्षा का क्रम बदला। अब शेरों से बचने के उपाय सिखाये जाने लगे। लेकिन पिछली सीखी हुई षिक्षाओं के कारण कुछ लोग शेर से बचने के लिए अभी भी वही उपाय करने लगे जो वह पहले कभी हाथी के समय करते थे जिसके परिणामस्वरूप वह शेर के खूनी पंजों की चपेट में आने लगे। धीरे-धीरे कुछ समझदार लोगों के समझाने पर वह लोग भी समझ गये कि शेर के आतंक से बचने के लिए उपाय शेर वाले ही करने होंगे। इस बार भी पहले की भांति इस समस्या का भी हल हुआ।
फिर समय गुजरा उन्हीं लोगों की अगली पीढ़ीयों ने अपने पुरखों द्वारा बताये गये सुरक्षा की षिक्षा भली प्रकार से याद कर ली। सदैव की भांति समय और परिस्थितियों ने फिर से पलटी खाई। वर्तमान पीढ़ीयों को एक बार फिर से अपना अस्तित्व बनाये रखने हेतु सुरक्षा के उपाय करने थे, किन्तु उन्होंने फिर वही गलती दोहराई जो कभी उनके उन पूर्वजों ने दोहराई थी जिसके कारण वह शेर के खूनी जबड़ों में फंसकर अत्यन्त अमूल्य जीवन को नष्ट कर बैठे थे। अब न तो हाथी के रूप में प्रकट रूप से बड़ी त्रासदी थी और न ही शेर का चेतावनीपूर्ण हमला। इस बार का संकट कुछ ऐसा था जिसे पहले समझ लेना ही अत्यन्त आवष्यक है। तभी उससे बचाव का उपाय निकलने का मार्ग बन सकता है। पीढ़ी-दर-पीढ़ी विकास होने के कारण हाथी और शेर रूपी आततायीयों ने मानव जीवन को नष्ट-भ्रष्ट करने के अलग-अलग तरीके का विकास किया। जो कभी अचानक हाथी की भांति आते थे और पूरी फसल को लूट-खसूटकर नष्ट करके निकल जाते थे। उनका उपाय करने पर वह समझ गये अब इस तरह से काम न चलेगा। फिर उन्होंने शेर की भांति घात लगाकर पूरी ताकत से हमला करने की रणनीति बनाई। लंबे समय तक वह इस रणनीति में कामयाब भी रहा। जब उसके जुल्म की हद अपनी चरम सीमा छूने लगी। तब कुछ समझदार लोगों के कारण अन्य सभी लोग भी समझ गये कि इस प्रकार के जुल्म करने वालो का नाष किस प्रकार से किया जाना चाहिए।
वर्तमान समय में यदि हम देखें तो आज जुल्म करने वाला व्यक्ति न हाथी की भांति अचानक आकर नुकसान करता है और न ही शेर की भांति घात लगाकर अचानक पूरी शक्ति से हमला कर जीवन नष्ट करता है। बल्कि अब उसने एक ऐसा विचित्र रूप धारण कर लिया है जिसे समझकर ही मनुष्य उसका सही उपाय निकाल सकता है। पुराने सभी उपाय उसके आगे निरर्थक सिद्ध होते हैं। अब वह लोमड़ी, बन्दर और गधे की भांति अनेकों प्रकार के करतब दिखाकर अपनी चालाकी से शेर की खाल पहन उस गधे की भांति हो गया है जो भीतर से कुछ और बाहर से कुछ और है। जो कभी वीरों की भांति शेर समान दहाड़ते हुए प्रकट होता है, परन्तु वास्तविक शेर के सामने आ जाने पर उसके अन्दर छिपा हुआ गधा डरकर रेंकने लगता है। उसने धर्म को राजनीति की रखैल बनाकर रख दिया है जो मात्र उस गधे के इषारों पर नाचने को तैयार रहती है जो उसे भूल से शेर समझी बैठी है। सफेद बगुले को हंस समझ कर उस मछली की भांति मानव का जीवन हो जाता है जिसको बगुला प्रेम की दृष्टि से नहीं अपितु स्वाद की लालच भरी दृष्टि से देखता है।
अतः हमें समझ लेना चाहिए कि हमें किस प्रकार इस समस्या का हल करना होगा? इस समस्या का हल एकता और बल के खड़ग के साथ-साथ ज्ञान, धर्म, प्रेम और सेवा की अदृष्य खड़ग को भी अपनाना होगा। गुरू हरगोबिन्द साहिब द्वारा धारण की गई मीरी-पीरी की राह को अपनाकर, समझकर हम इस समस्या से निदान पा सकते हैं। पहली पातषाही गुरू नानक साहिब जी से लेकर दसम गुरू गोविन्द सिंह तक के तमाम गुरूओं के जीवन से उनके गुणों को ग्रहण कर उनकी सेवा, त्याग, बलिदान, भक्ति, शक्ति और ज्ञान को समझकर और अपनाकर हम अपने जीवन की हर एक दुखों और परेषानियों का अंत कर सकते हैं। वह ज्ञान और शक्ति हमें कहीं और से नहीं बल्कि गुरूओं द्वारा दिखाई राह पर चलने से ही प्राप्त होगी। उनके उपदेषों को अपने जीवन में उतारकर ही प्राप्त होगी। अंत में बस इतना ही कहना चाहूंगा -
आज्ञा भई अकाल की, तभी चलायो पंथ।
सभ सिक्खन को हुकम है, गुरू मानयो ग्रंथ।

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