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मूर्ख गजेन्द्र-मूर्ख किसान, लानत है तुम पर!

Posted On: 24 Apr, 2015 Others,social issues में

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हाल ही में दिल्ली में हुई घटना जिसमें एक किसान गजेन्द्र ने राजनैतिक रैली के दौरान पेड़ पर चढ़कर गले में फांसी का फंदा लगा अपनी जान दे दी। ऐसा करके उक्त किसान क्या प्रदर्षित करना चाह रहा था? अपना रोष। किन्तु इससे उसे क्या प्राप्त हुआ? कुछ भी नहीं। क्या ऐसा कर उस सभी किसानों की वह समस्याओं का निदान हो गया जिसके कारण किसान गजेन्द्र फांसी के फंदे में झूल गया? बिल्कुल नहीं। यदि स्पष्ट रूप से बात करें तो किसानों के इस प्रकार का व्यवहार अत्यन्त ही मूर्खतापूर्ण और कायरना है। गलत सरकारी नीतियों के चलते गरीब किसान आत्महत्या कर लेते हैं और पीछे छोड़ जाते हैं अपने रोते-बिलखते गरीब परिवार। जिन्हें वही नेता, वही लोग नोच-नोचकर खाने की ताक लगाये बैठे होते हैं जिनके सामने गरीब किसान अपने दुखों की दुहाई देता है, इस उम्मीद में कि शायद कभी भेड़िये जो शक्तिषाली हैं उन भेड़ों की रक्षा करेंगे जो कि वह स्वयं हैं। अरे मूर्ख किसान! इतना भी नहीं समझता कि घोड़ा घास से दोस्ती करेगा तो खायेगा क्या। अरे पगले किसान! किसे दिखाना चाहता है? ये पत्थर दिल नेता यूं ही इन कुर्सियों तक नहीं पहुंचे हैं। न जाने कितने गरीब किसानों, गरीब लोगों, अबोध बच्चों की लाषों पर पैर रखकर पहुंचना पड़ता है इन पदों पर। और तू इन्हें मरकर इन मुर्दादिल लोगों को यह दिखाना चाहता है कि यह जाग जायें। ये पत्थर दिल नेता हैं सत्ता के लिए हजारों हजार लोगों को मार देते हैं तो तुम्हारी मौत से इनमें कुछ बदलाव न होगा।
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आत्महत्या करने से न तो ये मौकापरस्त नेता बदलने वाले हैं और न ही गरीबों के हालात। आत्महत्या करके मरने वाले ओ मूर्ख किसानों! तुमसे कहीं बेहतर तो वह नक्सली किसान हैं जिन्होंने गलत सरकारी नीतियों के चलते कायरता की राह न अपनाकर, अपने आत्मसम्मान की रक्षा हेतु उक्त सरकारी भेड़ियों से सषस्त्र टक्कर लेते हैं। सलाम हैं उन किसानों को, जिनके हाथ कभी हल उठाते थे, आज वह अपने उन शोषित भाईयों-बहनों के अधिकार व सम्मान की रक्षा के लिए उन सरकारी नरपिषाचों से लड़कर शहीद होना जानते हैं। जो इन आत्महत्या करने वाले मूर्ख-कायर किसानों से लाख गुना बेहतर हैं।
अंत में बस इतना ही कहना चाहूंगा। जब अधिकार किसी भी प्रकार के शांतिपूर्ण ढंग से प्राप्त न हों तब उनके लिए लड़ना कतई भी बुरा नहीं। क्योंकि किसी कायर की तरह लानतभरी मौत मरने से कहीं बेहतर एक शहीद की गौरवमयी मृत्यु है।

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