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योगासन क्या सर्वधर्म के लिए हैं या भगवाकरण....?

Posted On: 10 Jun, 2015 Others,Religious में

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आजकल बड़े जोरों-शोरों में योग का ग्लोबाइजेशन होने की बात सामने आ रही है। तरह-तरह के लोगों द्वारा रंग-बिरंगी बाते योग के बारे में सुनने को मिल रही हैं जैसे यौगिक क्रियायें या योग आसन मात्र हिन्दू धर्म के लोगों के लिए ही नहीं अपितु यह सम्पूर्ण मानव मात्र के लिए हैं। योग करने से तमाम तरह की बीमारियों से बचा जा सकता है, इससे स्वस्थ शरीर और स्वस्थ मस्तिष्क रखने में सहायता मिलती है। भाजपा सरकार आने के बाद जिसका नेतृत्व मोदी जी कर रहे हैं। जिनके नेतृत्व से देश को स्थिरता मिली है ऐसा उनके भक्तों का मानना है। उनके अनुसार वर्तमान सरकार के आने के बाद देश के लोगों को बहुत से फायदे हुए हैं जैसे सभी लोगों के आधार कार्ड बनाये गये हैं जिसका करना क्या है वह अब तक किसी को नहीं पता। इस प्रकार की अनेकोनेंक बातें जो वर्तमान परिदृश्य में देखने को मिल जाती हैं कि किस प्रकार सरकार के आने से पहले जनता से वादे किये गये थे और कितने वह पूर्ण हुए हैं यह तो सर्वदृश्य है।
अब मूल विषय पर आकर यदि बात करें तो जैसा कि भक्तों का कहना है कि योग मात्र हिन्दू धर्म के लोगों के लिए न होकर सम्पूर्ण मानव जाति के लिए हैं इसके लिए सर्वप्रथम योग आसनों के मूल सिद्धान्तों पर एक नजर डालना अत्यन्त आवश्यक होगा। योग का अर्थ मूलतः दो वस्तुओं का मिलना होता है अर्थात् यौगिक क्रियायें मात्र शारीरिक तंदरूस्ती के लिए ही न होकर आध्यात्मिक महत्व भी रखती है। तमाम प्रकार की यौगिक क्रियायें फिर वह चाहे सूर्यप्रणाम हो, कपालभाति, धनुषासन, शीर्षासन, शवासन या कुछ फिर कुछ और। यह सभी क्रियायें मात्र शारीरिक क्रियायें न होकर हिन्दु धर्म में बहुत अधिक आध्यात्मिक महत्व रखती हैं। प्रत्येक आसन के साथ किसी न किसी प्रकार से किसी हिन्दु कुल आराध्य देवता की उपासना का यौगिक क्रियाओं में विशेष महत्व है। जैसे सूर्यप्रणाम आसन जो अन्य सभी आसनों से सर्वप्रथम किया जाता है, इसमें सूर्य को मात्र सूर्य या कोई तारा न समझकर उसे एक ऐसे देवता की संज्ञा से नवाजा जाता है जो किसी व्यक्ति की भांति अपना कर्तव्य पूर्ण कर रहा है जो उसकी प्राणीमात्र के लिए बहुत बड़ी कृपा है। इसी प्रकार ओउम मंत्र का उच्चारण अनेकों आसनों में बोलकर तथा मानसिक रूप से जपकर किये जाते हैं। जिसका सभी यौगिक क्रियाओं में विशेष महत्व है। ओउम जो कि सृष्टि को रचने वाले ब्रहमा, पालने वाले विष्णु और संहारक शिव का प्रतीक है। अब यदि दूसरी ओर अन्य धर्मों की विचारधाराओं और उनके दर्शन की ओर देखें तो हमें यह विचार करना अत्यन्त ही सरल हो जायेगा कि यौगिक क्रियायें क्या सम्पूर्ण मानवजाति के लिए बनायी गई हैं या किसी धर्म विशेष हेतु।
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सर्वप्रथम इस्लाम धर्म से प्रारम्भ करते हैं जो इस समय इन क्रियाओं का पुरजोर विरोध कर रहे हैं और कुछ समर्थन। यदि इस्लाम के फलसफे की ओर नजर डाली जाये तो ओवैसी साहब कहीं से गलत नजर नहीं आते। अपितु वह एकमात्र ऐसे व्यक्ति दिखाई पड़ते हैं जो वाकई इस्लामिक सिद्धान्तों से किसी भी प्रकार का समझौता नहीं करना चाहते। फिर चाहे कोई भी उन्हें कुछ भी कहे। सत्य तो सत्य है जिसे कभी झुठलाया नहीं जा सकता। इस्लामिक सिद्धान्तों के अनुसार जहां तक मुझ ज्ञात है सम्पूर्ण सृष्टि का रचयिता एकमात्र ईश्वर या अल्लाह है। जिसे उसने स्वयं बिना किसी की सहायता के निर्मित किया है। वह स्वयं शक्तिमान है इसलिए उसे किसी की सहायता की कोई आवश्यकता ही नहीं। इस्लाम का जन्म ही ऐसे माहौल में हुआ था जब मूतिपूजा या बुतपरस्ती अपने चरम पर थी। तब पैगम्बर मोहम्मद साहब का जन्म हुआ। जिन्हें समय-समय पर अल्लाह के द्वारा आदेश मिले जिसे कलमबद्व कर कुरान शरीफ का नाम दिया गया। इस्लामी धारणा के अनुसार मात्र एक ईश्वर की इबादत करना ही जायज है और उसके साथ किसी भी अन्य की तुलना करना अर्थात देवी-देवता, मूर्ति, पेड़, पहाड़, पशु, पक्षी या उसके द्वारा रचित दुनिया की कोई भी वस्तु उसके समतुल्य मानना शिर्क कहा गया है जो इस्लाम में सबसे बड़ा गुनाह माना गया है।
इस प्रकार यदि विचार किया जाये जो किस प्रकार किसी मुस्लिम व्यक्ति द्वारा यौगिक क्रियायें करना और सूर्य को देवता मानकर उसकी उपासना करना उचित है। क्या वह शिर्क नहीं? अन्य सभी प्रकार या यौगिक क्रियायें जिसे स्वास्थ्य और आध्यात्म के अनुसार लाभकारी बताकर भोली-भाली जनता को तो गुमराह किया जा सकता है किन्तु कोई भी एक समझदार व्यक्ति जो अपने और अन्य धर्मों की थोडी भी जानकारी रखता है वह कुछ भी करने से पहले उसकी जड़ तक जाने के बाद ही उसके लिए तैयार होता है।
जैसा कि सर्वविदित है कि इस्लाम में नमाज का कितना महत्व है। नमाज जो कि मुस्लिम व्यक्ति के लिए दिन में पांच बार करने का नियम है। जो अपने आप में एक सम्पूर्ण यौगिक क्रिया ही है जिस प्रकार से नमाज पड़ने के वक्त बैठा जाता है उससे घुटने, कमर, हाथ, पैर, और अन्य अंगों की कसरत भी हो जाती है और एक ईश्वर को याद करने से मानसिक भोजन भी प्राप्त हो जाता है। इसलिए एक इस्लामिक व्यक्ति के लिए यही योग है और यही योगासन, जो इस्लामिक फलसफे के अनुसार जायज भी है और हर ओर से उचित भी।
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इसी प्रकार सिख धर्म की बात करें तो इस्लाम की तरह ही सिख धर्म का भी यही विश्वास है कि एक ईश्वर के अलावा कोई ऐसी सत्ता नहीं है जिसके समक्ष व्यक्ति ईश्वर की तुलना कर सके। ईश्वर ही सर्वव्यापी और सर्वशक्तिमान है। सिख धर्म के प्रथम गुरू श्री गुरू नानक साहिब जी ने अपनी बाणी में जगह-जगह इस प्रकार की क्रियाओं का खण्डन करते हुए इन्हें कूड़ अर्थात झूठ कहा है। गुरू नानक साहिब की बाणी आसा दी वार पर ही यदि हम गहनता से विचार करें तो पूरा मामला साफ हो जाता है। इसी प्रकार गुरू ग्रंथ साहिब में अनेकों अनेक स्थानों पर मात्र गुरू के शब्द अर्थात् गुरबाणी का पठन-पाठन और एक ईश्वर, अल्लाह, वाहेगुरू का सिमरन ही मोक्ष की राह बताया है।
दसम गुरू गोबिन्द साहिब जी जिन्होंने सिख का सिख से खालसा में परिवर्तित किया अर्थात भक्ति को शक्ति का खड्ग प्रदान किया। अब सिख पहले की भांति मात्र गुरूबाणी ही नहीं पढता था और उस पर अमल करता था बल्कि वह सदैव एक ईश्वर का नाम सिमरते हुए मानसिक भक्ति के साथ-साथ, बाहर से शस्त्रों को अभ्यास करने लगा। कसरत, घुड़सवारी, शस्त्रविद्या गुरू का सिक्ख करने के साथ-साथ वाहेगुरू का सिमरन और नाम अभ्यास मन ही मन सदैव करता रहता। जो वास्तव में सिक्खों का योग हो गया। गुरू साहिब ने सिक्खों को एक ऐसा योग सिखाया जिसे आज तक कोई न सिखा सका। तभी गुरू का एक-एक सिंघ जो कभी एक आम इंसान की ही भांति तमाम कमजोरियां लिए था। गुरू जी का खंडे-बाटे का अमृत चख कर गुरू की शिक्षा सदैव अपने मन में बसाकर, बाहर से अद्वितीय यौद्धा हो गया। जिस कारण उनमें ऐसी भक्ति की शक्ति का विकास हुआ जिससे बाबा दीप सिंह जी जैसे संतयोद्धा अपना सिर कट जाने के बाद भी कई घंटों दुश्मनों से लड़ते रहे। बाबा बंदा सिंह बहादुर जी की शक्ति जो अपने पुत्र को अपनी आंखों के सामने टुकड़े होते हुए देखकर भी वाहेगुरू की रजा में खुशी-खुशी ऐसी मृत्यु को प्राप्त हुए जिसके बारे में मात्र कल्पना से ही रूह कांप उठे। इस प्रकार सिख इतिहास में अनेकों अनेक शहीद हुए जिनकी भक्ति की शक्ति के कारनामे सुनकर मन अचंभित हो उठता है। लेकिन हां यह सच है ऐसे इस युग में भी सिक्ख इतिहास में यौद्धा हमारे सामने हुए जो पूरी फौज से अकेले ही लड़कर मानव मात्र की सेवा हेतु शहीद हो जाते हैं यही सिख धर्म का सच्चा योग है और यही सिक्ख की यौगिक क्रिया। —

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9 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

rameshagarwal के द्वारा
June 11, 2015

जय श्री राम हिन्दू एक ही भगवन को मानते नाम भिन्न हो जाते क्योंकि इसमें सबको स्वंतत्रता है.हिन्दू धर्म को समझने  में लोग  टीक से सोचते और पढ़ते नहीं केवल बदनाम करते.जैसे एक कॉलेज में प्रिंसिपल एक होता परन्तु हर विषय के अध्यक्ष होते इसीतरह सूर्य भगवन नहीं परन्तु मनुष्य के कल्याण के लिए एक शक्ति है जैसे कोई आपका कुछ करदे आप धन्यवाद् कहते इसीतरह नमस्कार में सूर्य को उसके द्वारा  रोध्नी उर्जा के लिए धन्यवाद देना.मुसलमान तो वन्देपत्रम का भी विरोध करते.क्या इस्लाम आतंकवाद के नाम निर्धोशो को मरने की इज़ाज़त देता.क्यों इस्लाम के नाम पर धर्मांतरण,मंदिरों को गिरना और लूटना जायज़ है?सिक्ख गुरुओ ने देश के लिए जी वलिदान किया उसके लिए देश आभारी है परन्तु कुछ लोग दोनों के बीच खाई खोदने का काम करते जो गलत है.आज कुछ सिक्ख पाकिस्तान के हाथ कैसे खेल रहे?

amarsin के द्वारा
June 11, 2015

Saadar dhanyavaad

yamunapathak के द्वारा
June 12, 2015

अमरसिन जी आपका यह ब्लॉग बहुत सुन्दर है यह साबित करता है कि वाकई योग सार्वभौमिक है इसका किसी धर्म विशेष से कोई लेना देना नहीं है. योग दिवस को मनाने के लिए किसी को बाध्य भी नहीं किया जा रहा है …सहजता से जो अपनाना चाहे वह कभी भी योग कर सकता है सूर्य नमस्कार योग का आसन नहीं है यह बस असीम ऊर्जा के प्रति कृतज्ञता है जो योगासन के कुछ आसन किसी वज़ह से चाहे वह समयाभाव हो या कोई विकार वे सूर्य नमस्कार के १२ अासन आसानी से कर सकते हैं.आपने मुस्लिम भाइयों के नमाज की स्थिति को बताया वह भी योग के कुछ आसन के साथ ही होते हैं .फिर तो सच ही यह योग का भगवाकरण नहीं है. साभार

PAPI HARISHCHANDRA के द्वारा
June 13, 2015

अमर सिंह जी ….गंभीर विषय पर गुड चिंतन है आपका । प्रवाह पर आगे भ्रम निवारण हेतु निर्मलता है। योग और योगासन मैं ऱात दिन का अंतर है । योगासन कोई भी मनुष्य किसी भी अवस्था मैं कोई भी कर सकता है । उसका उद्देष्य केवल शरीर को लचीला स्वस्थ रखना ही होगा । …..परंतु योग का उद्देष्य आत्मा का परमात्मा से शाक्षात्कार हेतु तपस्या ही है । साधारण मनुष्य तो ईसके प्रथम अंग यम को ही पार नहीं कर सकता । …्दूसरे या समाधी पहूॅचना तो सिर्फ ख्याली पुलाव भी नहीं हो सकते है । एक ब्राह्मण कुल के पंडित जो कर्म कांड के ज्ञाता हों । यज्ञोपवित धारण कर नित्य सुबह शाम संन्धय़ा वंधन कर अपना धर्म निभा रहे हों वे भी यम को नहीं लाॅघ पाते । एक धर्म भ्रष्ट योगी नहीं हो सकता और एक योग भ्रष्ट परमात्मा शाक्षात्कार नहीं कर सकता । गीता मैं कहा है योगी प्रयासी नष्ट भी नहीं होता ,किंतु अगले जन्म मैं कुलीन कुल मैं जन्रम लेकर योग की ओर प्रब्रत होता है । यानि की योगी भी वही हो सकता है जिसके पूर्व जन्म के शुभ कर्म हों । जिससे संस्कारवान होकर योग प्रसस्त होता है । मोदी जी का उद्रदेष्य योग नहीं योगासन ही होना चाहिए । जिस पर वे योग के विरोधाभाषी विकास मार्ग पर चलते विश्व गुरु बनने की चाहत पूरी करना चाहते हैं। योगासन विकास का मार्ग अवरोधक नहीं होगा और मोदी जी की जय जयकार होगी । मुसलमानों को वेवकूफ ना बनाते वे सत्य को स्वीकार करते कहें हाॅ योग हिंदुओं का ही परमात्मा शाक्षात्कार मार्ग है । जिसमैं योगासन को आम जनता की भलाई के लिए शुलभ किया जा रहा है प्रवाह को अनवरत करना ही मेरा उद्देश्य है | योग तन ,स्थान , और मन को निर्मल करके ही पाया जा सकता है | ओम शांति शांति

amarsin के द्वारा
June 13, 2015

हरीश चन्द्र जी मेरा यह लेख लिखने का मुख्या उद्देश्य ही यही था, की जो वास्तव में है उसे प्रस्तुत किया जाए…. योग और योगासन करने के अनेको लाभ है, किन्तु जिस प्रकार आजकल झूठ द्वारा यह प्रचारित किया जा रहा है मात्र वाह वाही की खातिर, की योग हिन्दू के लिए नहीं अपितु सभी धर्मो के लिए है, लेकिन कई बार कुछ सच बाते भी इस प्रकार से बोला जाए जिसमे चालबाजियों एवं स्वार्थ का मिश्रण हो तो वही झूठ में बदल जाता है…. जिसे अक्सर बुद्धिजीवी वर्ग पकड़ ही लेते है फिर झूठ की पोल खुलते ही संशय के बादलो के बीच अच्छी चीज का भी विरोध होने लगता है और अन्तः वह हाशिये में चली जाती है…..

Shobha के द्वारा
June 15, 2015

योग केवल स्वास्थ्य की लिए हैं इसमें कोई करण नहीं है

Shobha के द्वारा
June 15, 2015

योग केवल स्वास्थ्य की लिए हैं इसमें कोई करण नहीं है हमार देश मैं हर बात का धर्मनिरपेक्षता के नाम पर बतंगड़ बनाना एक आदत बन गई है लम्बी उम्र तक जीना है स्वास्थ्य पर ध्यान दो योग करो नहीं तो धर्म निरपेक्षता की चर्चा करते रहो

RAJESH के द्वारा
June 15, 2015

HELLO AMRASIN JI. KYA AAP BTA SAKTE HO SABSE PAHLE IS DUNIYA ME KONSA DHARM THA, AUR KAB MUSLIM DHARM BNA THA AUR KAB SIKH DHARM BNA AGAR BTA DOGE TO APKI BAAT MAN LUGHA

amarsin के द्वारा
June 15, 2015

यदि देखा जाए तो सबसे पहले आदि मानव थे जो प्रकृति का रोद्र रूप देख कर भयभीत हो अथवा उस पर नियंत्रण न कर पाने के कारण जैसे बारिश, तूफ़ान, गर्मी, सर्दी, अन्धकार, जंगली जानवर, कीड़े मकोड़े, जहरीले जीवो से भयभीत होकर उनका ही पूजन करने लगा, जो मूर्ती पूजा का प्रारंभिक काल था और भय पर निर्मित था. उसके फिर २००० साल पहले ईसाई धर्म का प्रवर्तन हुआ, उसके पश्चात इस्लाम, बोध, जैन और ३०० वर्ष पूर्व सिख धर्म का प्रवर्तन हुआ. इस प्रकार धर्म उनत्ति karte karte अब तक अनेको धर्मो और विचारधाराओ तक पंहुचा है…. इसमे पुराण और naye का सवाल नहीं मात्र उनत्ति, darshan और जीने के ढंग का भी है….


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