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शुर्तरमुर्गासन

Posted On: 19 Jun, 2015 Others,social issues,Politics में

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जैसा कि आजकर बड़े जोरों-षोरों से 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाने की तैयारी की जा रही है। जगह-जगह योग क्रियाओं के लाभ बताये जा रहे हैं, कैंप लग रहे हैं, एसएमएस द्वारा प्रचार किया जा रहा है। इलेक्ट्राॅनिक मीडिया, प्रिंट मीडिया, सोषल मीडिया में भक्त लोग अपनी आदत के अनुसार बड़े-बड़े प्रवचन देकर अपने अहंकार को संतुष्ट करते दिख रहे हैं। कई ऐसे भी लोग दिखने को मिल रहे हैं जिन्हें योग के बारे में कुछ भी नहीं पता, सूर्य अस्त, बंदा मस्त वाली कहावत उन पर एकदम पूरी उतरती है। ऐसी हालत में इस प्रकार के मुद््दे आम जनता को तो भ्रमित कर सकते हैं लेकिन जिनमें थोड़ी सी भी विचारषीलता और समझ है, वह इस स्थिति को गंभीरतापूर्वक समझ रहे हैं।
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अरे भाई! पहले कोई यह तो बताये कि भाजपा ने शासन में आने से पहले अपने चुनावी एजेन्डे में क्या-क्या दिया था। उसमें तो इस प्रकार की बातें कहीं न थी। कालाधन, जनलोकपाल बिल, महंगाई, बेरोजगारी, षिक्षा, स्वास्थ्य जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे जो उस समय चल रहे थे। शासन में आने के बाद कुछ अलग ही हवायें चलने लगी। कालाधन लाने के बजाये, लोगों के बैंकों में खाते खुलवाये जाने लगे। भ्रष्टाचार खत्म करने और महंगाई कम करने के स्थान पर गैस सब्सिडी जनता को दिलाने के नाम पर पहले से अधिक दरों पर जनता को मजबूर कर दिया गया। अभी तो सरकार ने जनता का सिर ही मूंडा था इस पर सब्सिडी छोड़ने की बात कहकर उन पर ओले डालने का काम भी मोदी जी कर दिखाया। भई मान गये, अच्छे दिन आने वाले हैं, परन्तु किसके? समझदार के लिए तो इषारा ही काफी है।
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जनता को योग नहीं अन्न चाहिए।
किसी महापुरूष ने सही ही कहा है, भूखे पेट भजन न होत। यदि व्यक्ति दो जून की रोटी कमाने के लिए सारा दिन कड़ी मेहनत करता है और अपने परिवार और अधिक सुखद जीवन देने के लिए रात को भी ओवरटाईम करके महंगाई और भ्रष्टाचार की मार को झेलता हुआ जिन्दगी जीता है। तो क्या आप अब भी उससे यह उम्मीद रखते हैं कि भाई सुबह सूर्य उगने से पहले 1 या 2 घंटे योगासन भी करे। कमाल है, चुनाव से पहले ऐसा तो किसी ने नहीं बताया था कि महंगाई कम नहीं होगी, योग करके अपनी कार्यक्षमता बढ़ाकर और अधिक कार्य करने में सक्षम बनो और तमाम दुखों से निजात पाओ।
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योग करना सही है कहीं भी गलत नहीं लेकिन क्या उससे अधिक आवष्यक देष के सभी वर्गों को ध्यान में रखते हुए खासकर गरीब और मेहनतकष लोग जिनके दिन का अंत अगले दिन के कार्यों की सूची बनाने में होता है, उनका ध्यान रखना नहीं है? उनकी मूल आवष्यकताएं जैसे गरीबी, बेरोजगारी, महंगाई और भ्रष्टाचार से निजात अधिक आवष्यक नहीं है जो इस समय सरकार की सूची में ही नहीं है। उन गरीब किसानों का क्या हुआ? जिनकी जमीनें किसी समय छीन ली गई थी? उन लोगों का क्या हुआ जिनकी सजाएं पूरी हो जाने के बाद भी वह सालों साल से जेलों में सड़ रहे हैं? लाखों ऐसे केस जो कचहरियों में मात्र फाइलें बनकर ही रह गई है, पर उनका निर्णय किसी को नहीं पता कि कब होगा। ऐसे हालातों में देष की जनता का ध्यान मोड़ने के लिए योग ही ठीक है। जिसे मैं एक अलग ही नाम दूंगा और वो है शुर्तुरमुर्ग योग। यही आज हिन्दुस्तान की आम जनता के साथ हो रहा है।

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