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amarsin


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वो इक कराह…

Posted On: 10 Sep, 2016  
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Religious कविता में

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धर्म, दृष्टि, इच्छा और सोच

Posted On: 23 Jun, 2015  
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Others Religious में

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शुर्तरमुर्गासन

Posted On: 19 Jun, 2015  
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Others Politics social issues में

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काला बनाम सफ़ेद

Posted On: 13 Jun, 2015  
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Others Religious social issues में

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बच्चे मन के सच्चे

Posted On: 14 Mar, 2015  
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के द्वारा: amarsin amarsin

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के द्वारा: vikaskumar vikaskumar

अमर सिंह जी ....गंभीर विषय पर गुड चिंतन है आपका । प्रवाह पर आगे भ्रम निवारण हेतु निर्मलता है। योग और योगासन मैं ऱात दिन का अंतर है । योगासन कोई भी मनुष्य किसी भी अवस्था मैं कोई भी कर सकता है । उसका उद्देष्य केवल शरीर को लचीला स्वस्थ रखना ही होगा । .....परंतु योग का उद्देष्य आत्मा का परमात्मा से शाक्षात्कार हेतु तपस्या ही है । साधारण मनुष्य तो ईसके प्रथम अंग यम को ही पार नहीं कर सकता । ...्दूसरे या समाधी पहूॅचना तो सिर्फ ख्याली पुलाव भी नहीं हो सकते है । एक ब्राह्मण कुल के पंडित जो कर्म कांड के ज्ञाता हों । यज्ञोपवित धारण कर नित्य सुबह शाम संन्धय़ा वंधन कर अपना धर्म निभा रहे हों वे भी यम को नहीं लाॅघ पाते । एक धर्म भ्रष्ट योगी नहीं हो सकता और एक योग भ्रष्ट परमात्मा शाक्षात्कार नहीं कर सकता । गीता मैं कहा है योगी प्रयासी नष्ट भी नहीं होता ,किंतु अगले जन्म मैं कुलीन कुल मैं जन्रम लेकर योग की ओर प्रब्रत होता है । यानि की योगी भी वही हो सकता है जिसके पूर्व जन्म के शुभ कर्म हों । जिससे संस्कारवान होकर योग प्रसस्त होता है । मोदी जी का उद्रदेष्य योग नहीं योगासन ही होना चाहिए । जिस पर वे योग के विरोधाभाषी विकास मार्ग पर चलते विश्व गुरु बनने की चाहत पूरी करना चाहते हैं। योगासन विकास का मार्ग अवरोधक नहीं होगा और मोदी जी की जय जयकार होगी । मुसलमानों को वेवकूफ ना बनाते वे सत्य को स्वीकार करते कहें हाॅ योग हिंदुओं का ही परमात्मा शाक्षात्कार मार्ग है । जिसमैं योगासन को आम जनता की भलाई के लिए शुलभ किया जा रहा है प्रवाह को अनवरत करना ही मेरा उद्देश्य है | योग तन ,स्थान , और मन को निर्मल करके ही पाया जा सकता है | ओम शांति शांति

के द्वारा: PAPI HARISHCHANDRA PAPI HARISHCHANDRA

के द्वारा: amarsin amarsin

जय श्री राम हिन्दू एक ही भगवन को मानते नाम भिन्न हो जाते क्योंकि इसमें सबको स्वंतत्रता है.हिन्दू धर्म को समझने  में लोग  टीक से सोचते और पढ़ते नहीं केवल बदनाम करते.जैसे एक कॉलेज में प्रिंसिपल एक होता परन्तु हर विषय के अध्यक्ष होते इसीतरह सूर्य भगवन नहीं परन्तु मनुष्य के कल्याण के लिए एक शक्ति है जैसे कोई आपका कुछ करदे आप धन्यवाद् कहते इसीतरह नमस्कार में सूर्य को उसके द्वारा  रोध्नी उर्जा के लिए धन्यवाद देना.मुसलमान तो वन्देपत्रम का भी विरोध करते.क्या इस्लाम आतंकवाद के नाम निर्धोशो को मरने की इज़ाज़त देता.क्यों इस्लाम के नाम पर धर्मांतरण,मंदिरों को गिरना और लूटना जायज़ है?सिक्ख गुरुओ ने देश के लिए जी वलिदान किया उसके लिए देश आभारी है परन्तु कुछ लोग दोनों के बीच खाई खोदने का काम करते जो गलत है.आज कुछ सिक्ख पाकिस्तान के हाथ कैसे खेल रहे?

के द्वारा: rameshagarwal rameshagarwal

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के द्वारा: DEEPTI SAXENA DEEPTI SAXENA

के द्वारा: Madan Mohan saxena Madan Mohan saxena

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के द्वारा: Ritu Gupta Ritu Gupta

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भारत पर अनेकों विदेशियों ने हजारों साल तक राज किया जिसका प्रभाव हिन्दी पर सर्वाधिक पड़ा। जिस कालखंड में जिस शासक का शासनकाल चला, उसकी मातृभाषा ही राजभाषा घोषित हुर्इ। जो लम्बे समय तक प्रयोग में आने के कारण आम जनमानस द्वारा हिन्दी में इस प्रकार घुलमिल गर्इ जिसे पृथक-पृथक समझ पाना अत्यन्त ही कठिन हो गया। हिन्दी में व्यवहारिक बोलचाल में आज सर्वाधिक उर्दू के शब्द सर्वाधिक प्रयोग किये जाते हैं जिसे कोर्इ भी सामान्य समझ वाला व्यकित उर्दू के शब्दों को अन्य न जानकर हिन्दी के रूप में ही जानता है। मुगल शासन के पश्चात भारत पर लगभग 100 वर्षों तक अंग्रेजों ने शासन किया। उन्होंने भी गत शासकों की ही भांति अपनी सुविधा हेतु अपनी मातृभाषा अंग्रेजी को ही राजभाषा घोषित कर दिया। हिन्दी जब अंग्रेजी की सरपरस्ती में आर्इ तो वह अब पहले की भांति और अधिक समृद्ध न हो सकी। अपितु दिनों-दिन उसकी स्थिति बद से बदतर होने लगी। कारण स्पष्ट था। हिन्दी और अंग्रेजी के बीच वैसा तालमेल न बैठना जैसा अन्य भाषाओं के साथ क्योंकि हिन्दी अपने-आपमें एक पूर्ण रूप से समृद्ध भाषा है। संस्कृत-हिन्दी व्याकरण का अति उत्कृष्ट स्तर का होना, प्रत्येक शब्द का पूर्णरूपेण सही स्थान पर सही प्रयोग होना, हिन्दी की वैज्ञानिकता को दर्शाता है। बढ़िया आलेख अमर सिन जी !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

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के द्वारा: sadguruji sadguruji

के द्वारा: Bhagwan Babu Bhagwan Babu

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महोदय निम्नलिखित पंक्तियाँ आपके लेख की हैं फिर आप या हम किसी धर्मगुरु पर इस तरह से लांछन क्यों लगाने लगते हैं. आसाराम बापू गलत हैं या सहीं, इस बारे में कुछ भी ठोस राय कायम करना सही न होगा। सही और गलत का फैसला हमें किसी भी प्रकार की सुनी-सुनार्इ बातों के आधार पर नहीं करना चाहिए अपितु सम्पूर्ण परिदृश्य को दृषिटगत रखते हुए करना चाहिए। बेशक आश्रम में बहुत से विवादास्पद कृत्यों की घटनायें मीडिया द्वारा सबके समक्ष आयी हैं किन्तु फिर भी यह कहना उचित न होगा कि धार्मिक संस्थानों पर बिल्कुल भी विश्वास नहीं किया जाना चाहिए। इस प्रकार के धार्मिक संगठनों की कभी-कभार कुछ घटनायें सबके समक्ष आ जाती हैं किन्तु फिर भी इन संगठनों ने समाज के उत्थान के लिए बहुत बड़ा योगदान भी दिया है। जो मीडिया को उजागर करना चाहिए,

के द्वारा: rastogikb rastogikb

के द्वारा: seemakanwal seemakanwal

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